श्री गणेश के पावन स्वरुप का महात्म्य

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Ganesh

 

प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश की अर्चना के बिना किसी मांगलिक कार्य के निर्विघ्न संपन्न होने में संशय ही रहता है। पूजन की थाली में भी श्री गणेश के स्वरुप स्वस्तिक चिन्ह को बनाकर शेष कार्य किये जाते हैं। श्री गणेश का बीज मन्त्र “गं” है। स्वस्तिक चिन्ह बनाने में चार गणेश बीज मन्त्रों का होना श्री गणेश के जन्म दिवस गणेश चतुर्थी का द्योतक है। श्री गणेश के चतुर्थी में जन्म लेने का तात्पर्य यह है कि चार अवस्थाओं – जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय में चौथी अवस्था तुरीय बुद्धि का प्रतीक है। अतः भगवान गणेश को सदबुद्धि प्रदाता भी कहा जाता है।

भगवान गणेश का प्रत्येक अंग अपने आप में एक सदविशेषता लिए हुए है। भगवान गणेश के अंगों को इस प्रकार भी समझा सकता है।

भगवान गणेश का ठिंगना (छोटे कद का) स्वरूप हमें यह शिक्षा देता है कि समाज की सेवा करते हुए हम स्वयं को अपने सभी सदगुणों के साथ छोटा (लघु) मानकर चलें। हममें अहंकार उत्पन्न न हो। अभिमान रहित व्यक्ति ही सभी कार्यों को निर्विघ्न संपन्न कर सकता है।

भगवान गणेश का चौड़ा मस्तक बुद्धि (विचार शक्ति) का केंद्र है, उनमें बुद्धि, धैर्य और गाम्भीर्य का प्रधान तत्व है। बड़े सिर से हमें शिक्षा मिलती है कि हमें अधिकतम ज्ञान प्राप्त करने पर ध्यान देना चाहिए। एक साधक को भी भगवान की इसी विशेषता का अनुसरण करना चाहिए।

भगवान गणेश के कान बड़े हैं जो कि साधक को सिखाते हैं कि वह सबकी सुन लें, परन्तु धीरता और गंभीरता से सभी बातों पर विचार कर निर्णय लें। इसी प्रकार के व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में सफलता प्राप्त करते हैं।

श्री गणेश लम्बोदर हैं। इस तथ्य से हमें शिक्षा मिलती है कि मानसिक रूप से व्यक्ति का पेट मोटा होना चाहिए अर्थात वह सभी की बातें भली या बुरी सुन ले, तो भी उन्हें अपने पेट में रखें। उन्हें अनावश्यक रूप से प्रदर्शित न करे, उचित समय आने पर ही उन बातों का उपयोग करे।

श्री गणेश की छोटी आँखें हमें किसी भी बात को सूक्ष्मता से विश्लेषण करने पर बल देती हैं, अर्थात किसी भी बात की तह तक जाना , केवल सुनी सुनाई बातों पर विश्वास न करना तथा स्वयं खोजबीन करना। जब साधक स्वयं किसी तथ्य की जांच पड़ताल करता है तो किसी के लिए भी उसे मुर्ख बनाना संभव नहीं होता।

भगवान गणेश एकदन्त है। जब यह कहा जाता है कि अरे! वे लोग तो एक दांत से रोटी खाते हैं, उनमें तो बड़ी एकता है, तो यहां भगवान का यह स्वरुप हमें एकता का सन्देश देता है। भगवान को लड्डू अति प्रिय है। लड्डू बनाने के लिए अलग-अलग बिखरी हुई बूंदी को एकत्र किया जाता है। इसी प्रकार व्यक्तियों का सुसंगठित समुदाय जितना अच्छा काम कर सकता है, अकेला व्यक्ति उतना अच्छा काम नहीं कर सकता, भगवान का मोदक हमें यही शिक्षा देता है।

भगवान गणेश के वाहन मूषक का स्वभाव होता है कि वह प्रत्येक वस्तु को काट देता है, वह नया, पुराना या अच्छा-बुरा नहीं देखता। कुतर्की या असामाजिक लोग भी यह नहीं सोचते कि कोई प्रसंग कितना सुन्दर, हितकर और मधुर है। वे अपने स्वभाववश उसे ख़राब करने की या बिगाड़ने की चेष्टा करते हैं, परन्तु प्रबल बुद्धि के आते ही कुतर्क दब जाता है। श्री गणेश बुद्धि के देवता है। अतः उन्होंने कुतर्की रूपी मूषक को वाहन के रूप में अपने नीचे दबा रखा है।

इस प्रकार भगवान श्री गणेश के परम सुखदायक मंगलमय स्वरूप का ध्यान कर उनके अंग से कुछ न कुछ शिक्षा प्राप्त करने का प्रयास करें।

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