नव वर्ष के नव संकल्प

भारत समेत पूरा विश्व नव वर्ष 2018 का उत्साहपूर्वक स्वागत कर रहा है। भिन्न-भिन्न संस्कृतियॉं भिन्न-भिन्न आधार पर अपना नववर्ष मनाती है। यह नववर्ष जिसका प्रारंभ अंग्रेजी माह जनवरी से होता है, ग्रेगोरियन कैलेंडर के आधार पर मनाया जाता है। भारत में भी कई संस्कतियॉं अपने अपने अनुसार नववर्ष मनाती है, जैसे भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति में नववर्ष चेत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन मनाया जाता है। क्योंकि इस दिन प्रकृति में नवसृजन रुपी परिवर्तन होते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि इस दिन भगवान ब्रह्मदेव ने सृष्टि की रचना की थी। इसके अलावा सिंधी समाज नववर्ष को चेटीचांड के रुप में मनाता है, मराठीजन पोंगल के रुप में अपना नववर्ष मनाते हैं। इसी प्रकार भारत में ही कई धर्म के लोग अलग-अलग प्रकार से अपना-अपना नववर्ष मनाते हैं। परन्तु देश में कई लोग 1 जनवरी को भी नववर्ष के रुप में मनाते हैं। अतः आवश्यकता है कि इस नववर्ष हम अपने देश, समाज, संस्कृति एवं धर्म के सर्वांगिण विकास के लिए नव संकल्प लेंः-

  • दलगत राजनीति से ऊपर उठकर मतदान करनाः- हमारे देश में हर वर्ष चुनाव होते रहते हैं तथा चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्यौहार होता है। परन्तु अन्य धार्मिक त्यौहारों की भांति इस त्यौहार को पुरी श्रद्धा के साथ नहीं मनाया जाता है। जब चुनाव होते हैं, तब कई बार मतदाता जाति, संप्रदाय, धर्म एवं राजनैतिक दल के अनुसार मत देते हैं। वे यह नहीं देखते कि जिस व्यक्ति को वे लोग मत दे रहे हैं, वह व्यक्ति योग्य है या नहीं। मतदाता को किसी भी उम्मीदवार की केवल योग्यता देखनी चाहिए कि वह उम्मीदवार संबंधित पद के योग्य है या नहीं। आइये! इस नववर्ष हम यह संकल्प लें कि हम सदैव उम्मीदवार की योग्यता एवं क्षमताएॅं देखकर ही मत देंगे।
  • शिक्षा:- शिक्षा प्राप्त करना हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार होता है। परन्तु आज भी हमारे देश में यह देखने में आता है कि कई बार कुछ कारणों से बच्चों को शिक्षा से वंचित रखा जाता है। यह अधिकतर बालिकाओं के साथ होता है। या तो उन्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा ही नहीं जाता है या कुछ समय बाद उनकी शिक्षा पर रोक लगवा दी जाती है। शिक्षित व्यक्ति ही अपने परिवार एवं देश के विकास में अपना सही योगदान दे सकता है। आइये! इस नववर्ष यह संकल्प लें कि हम सभी को समान रुप से शिक्षित करेंगें।
  • लैंगिक समानताः- भारत की सनातन संस्कृति में दैहिक एवं लौकिक आवश्यकताओं के लिए हम दैवियों पर निर्भर हैं, जैसे कि मॉं गायत्री से मेधा, मॉं सरस्वती से ज्ञान तथा मॉं लक्ष्मी से धन की कामना करते हैं। परन्तु आज कई क्षेत्रों में लैंगिक असमानता है। सनातन संस्कृति में यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते, तत्र रमन्ते देवता के आधार पर महिलाओं को पूजने योग्य बताया गया है। परन्तु आज यदि हम उद्योग जगत में बात करें तो, उसमें भी महिला सीईओं का वेतन अपने समकक्ष किसी पुरुष सीईओं के मुकाबले बहुत कम होता है। इसी प्रकार की विसंगतियां शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य मूलभूत अधिकारों में भी देखने को मिलती है। अतः आज आवश्यकता है भारत में लैंगिक समानता को लागु कर महिलाओं को भी उनके समान अधिकार दिये जाएॅं। इस नववर्ष यह संकल्प लें कि हम किसी भी स्तर पर किसी भी क्षेत्र में लैंगिक असमानता का समर्थन नहीं करेंगे।
  • आरक्षणः- आरक्षण का मुख्य सिद्धान्त यह है कि समाज के वे हिस्से जो ऐतिहासिक कारणों से सामाजिक व आर्थिक रुप से पीछे रह गए हों, उन्हें मुख्यधारा में लाने हेतु कुछ विशेष लाभ दिये जाएॅं। भारत में जाति, धर्म, पंथ आदि आधारों पर आरक्षण दिया जाता है, परन्तु इन आधारों पर आरक्षण देना समाज को नुकसान पहुॅंचाता है। क्योंकि कई बार ऐसा देखने को मिलता है, कि आरक्षित वर्ग के एक ही परिवार की कई पीढ़ियॉं आरक्षण का लाभ लेती रहती हैं व आरक्षण के असली हकदार वंचित ही रह जाते हैं। भारत के संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर भी आरक्षण को कुछ वर्षों के बाद समाप्त करने के पक्ष में थे। आरक्षण का लाभ जाति एवं धर्म के आधार पर न होकर आर्थिक आधार पर होना चाहिए तथा आरक्षित समूहों की समय समय पर समीक्षा भी की जानी चाहिए।

आशा ही नहीं, वरन पूर्ण विश्वास है कि हम इन नवसंकल्पों के साथ अपने नववर्ष की शुरुआत करेंगे तथा समाज और देश के विकास में अपना योगदान देंगे। नववर्ष 2018 की हार्दिक शुभकामनाएॅं।

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