दुनिया का सबसे लंबा त्यौहार ”बस्तर दशहरा“ – नहीं होता रावण दहन

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छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा विश्व का सबसे लंबी अवधि तक मनाया जाने वाला पर्व है। सहकार और समरसता की भावना के साथ यह 75 दिवसीय पर्व हरियाली अमावस्या से लेकर आष्विन माह तक चलता है। इसमें सभी वर्ग, समुदाय और जाति-जनजातियों का योगदान महत्वपूर्ण होता है। प्रत्येक बस्तरिया का माईजी के प्रति अगाध प्रेम व आस्था पर्व में झलकता है।
पर्व की शुरुआत हरियाली अमावस्या को माचकोट जंगल से लाई गई लकड़ी (ठुरलू खोटला) पर पाटजात्रा रस्म के साथ होती है। इसके बाद बिरिंगपाल गांव के ग्रामीण सीरासार भवन में सरई पेड़ की टहनी को स्थापित कर डेरीगड़ाई रस्म पूरी करने के साथ विषाल रथ निर्माण के लिए जंगलों से लकड़ी शहर पहुंचाने की प्रक्रिया षुरु करते हैं। झारउमरगांव व बेड़ाउमरगांव के ग्रामीण रथ निर्माण की जिम्मेदारी निभाते हैं।
रथ निर्माण के बाद पितृमोक्ष अमावस्या के दिन काछनगादी पूजा का विधान होता है। इसके दूसरे दिन ग्राम आमाबाल के हलबा समुदाय का एक युवक सीरासार में 9 दिनों की निराहार योग साधना में बैठकर कल्याण की कामना करता है। इस दौरान प्रतिदिन षाम को माईजी के छत्र को विराजित कर रथ परिक्रमा की जाती है। रथ में माईजी के छत्र को चढ़ाने और उतारने के दौरान बकायदा सशस्त्र सलामी दी जाती है। रथ परिचालन में आधुनिक तकनीक और यंत्रों का उपयोग नहीं होता। पेड़ों की छाल से तैयार रस्सी से ग्रामीण रथ को खींचते हैं।
बस्तर दशहरा में संभाग के अलावा धमतरी और महासमुंद-रायपुर जिले के देवी-देवताओं को भी आमंत्रित किया जाता है। यह पर्व में सहकार के साथ एकता का भी प्रतीक है। वहीं पर्व के अंतिम पड़ाव में मुरिया दरबार लगता है। जहां मांझी-मुखिया और ग्रामीणों की समस्याओं को सुना और निराकरण किया जाता है। मुरिया दरबार में पहले समस्याओं का समाधान राजपरिवार करता था, अब यह जिम्मेदारी प्रषासनिक अधिकारी निभाते हैं। इसके बाद दंतेवाड़ा के दंतेष्वरी माई की डोली व छत्र को दूसरे दिन भेंट व सम्मान के साथ विदा किया जाता है।
काछनदेवी और दशहरा
बस्तर दशहरा में काछन पूजा अनिवार्य रस्म है, क्योंकि पर्व व रथपरिचालन की अनुमति काछनदेवी ही देती हैं। जानकारों के अनुसार 1725 ईस्वी में काछनगुडी क्षेत्र में माहरा समुदाय के लोग रहते थे। तब यहां हिंसक पषुओं का आतंक था और इनसे सुरक्षा के लिए कबिले के मुखिया जगतू माहरा ने तात्कालिक नरेश दलपतदेव से भेंटकर जंगली पषुओं से अभयदान मांगा। षिकार प्रेमी राजा इस इलाके में पहुंचे तथा लोगों को राहत दी, वहीं यहां के प्राकृतिक व सात्विक वातावरण से प्रभावित होकर बस्तर की बजाए जगतुगुडा को राजधानी बनाया। इससे माहरा कबिला जहां राजभक्त हो गया, वहीं राजा ने कबिले की ईष्टदेवी काछनदेवी से अष्विन अमावस्या पर अषीर्वाद व अनुमति लेकर दशहरा उत्सव प्रारंभ किया। तब से यह प्रथा चली आ रही है।
चार फीट के गड्ढे में 9 दिनों की साधना
मान्यताओं के अनुसार बरसों पहले आमाबाल परगना की हलबा जाति का कोई युवक निर्विघ्न दशहरा मनाने और लोगों को शुभकामना देने के लिए राजमहल के समीप योग साधना में बैठ गया था, तब से यह प्रथा चली आ रही है। जिसे राजपरिवार व प्रषासन की ओर से सम्मान स्वरुप भेंट दिया जाता है। वहीं 9 दिनों तक परिवार के सदस्यों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है। हलबा समाज के सदस्य बताते हैं कि समुदाय के सदस्य वर्ष 1414 से दशहरा की सफलता और लोगों की सुख-समृद्धि की कामना के लिए जोगी बनते आ रहें है।
मावली परघाव
पर्व में षामिल होने दंतेवाड़ा से माईजी के छत्र-डोली अष्विन नवमी को शहर पहुंचते है। जिसका भव्यता के साथ स्वागत किया जाता है। आस्था और भक्तिभाव से पूर्ण इस दृष्य को देखने स्थानीय के साथ विदेषी पर्यटक भी घंटों इंतजार करते हैं।
अर्धरात्रि को बलि
पर्व के दौरान पषु-पक्षियों की बलि दी जाती है। लेकिन अष्विन अष्टमी को निषाजात्रा रस्म में दर्जनों बकरों की बलि आधी रात को दी जाती है। इसमें पुजारी एवं भक्तों के साथ राजपरिवार के सदस्यों की मौजूदगी होती है।
सात्विक बलि
नवरात्र के चलते पर्व के दौरान दंतेष्वरी मंदिर, राममंदिर, सिहड्योढी व अन्य कुछ स्थान विषेश पर बकरे की जगह रखिया कुम्हडा की बलि दी जाती है।
नहीं होता रावण दहन
दशहरा के अवसर पर पूरे भारत में जहां रावण दहन किया जाता है, वहीं बस्तर में यह परंपरा नहीं है। दशहरा के मौके पर पूर्व कलेक्टर प्रवीरकृष्ण ने लालबाग मैदान पर रावण दहन कार्यक्रम की शुरुआत कराई थी, लेकिन यह एक ही बार हुआ। बस्तर के ग्रामीण अंचलों में रावण दहन नहीं किया जाता है। अपितु बाहर से शासकीय कर्मचारियों किरंदुल-बचेली व उत्तर बस्तर के कुछ हिस्सों में रावण दहन कार्यक्रम का आयोजन करते हैं।

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